नेटवर्क छतरपुर। "कोई भी महामारी मनुष्य के पौरुष को पराजित नहीं कर सकती, इसके पूर्व भी अनेक महामारियों पर मनुष्य अपने पुरुषार्थ के बल पर जीत हासिल कर चुका हैं।"उक्त विचार पेराडीनिया विश्वविद्यालय, श्रीलंका में कार्यरत प्रो सुमाथी सिवमोहन ,प्राध्यापक अंग्रेजी ने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में संस्कृति,साहित्य एवं राष्ट्रवाद पर विमर्श विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में अतिथि वक्ता के रूप में व्यक्त किये।इस सार्थक अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन शासकीय महाराजा महाविद्यालय,छतरपुर, मप्र के अंग्रेजी विभाग द्वारा 12 जून 20 शुक्रवार को आयोजित किया गया था।
इस अन्तर्राष्ट्रीय वेबिनार के मीडिया कॉर्डिनेटर डॉ सुमति प्रकाश जैन ने जानकारी देते हुए बताया कि वेबिनार के प्रारंभ में प्राचार्य डॉ डी पी शुक्ला ने वेबिनार के मुख्य संरक्षक, प्रो टी आर थापक, कुलपति, महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड
विश्वविद्यालय, छतरपुर,अध्यक्षता कर रहे डॉ प्रवीण जोशी,प्रेरणा महाविद्यालय, नागपुर, अतिथि वक्ता, प्रो निवेदिता मैत्रा,विभागाध्यक्ष, डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर,प्रो सुमाथी सिवमोहन, पेराडेनिया विश्वविद्यालय, श्री लंका,प्रो आनंद शर्मा,त्रिभुवन विश्वविद्यालय, काठमांडू, नेपाल,डॉ डीनाली फर्नांडो,केरालिया विश्वविद्यालय, श्रीलंका,मीडिया कोऑर्डीनेटर डॉ एस पी जैन एवम आयोजन समिति तथा सलाहकार समिति का स्वागत किया।
वेबिनार के मुख्य संरक्षक कुलपति प्रो टी आर थापक ने उदघाटन वक्तव्य देते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में पूर्व से ही लॉकडाउन जैसे शब्द के लिए एकांतवास शब्द है, जिसमें मनुष्य स्वयं से साक्षात्कार करके आंतरिक ऊर्जा तथा प्रसन्नता की अनुभूति करता है। कोरोना महामारी के समय आज स्वच्छता तथा शारीरिक दूरी पर विशेष बल दिया जा रहा है, जबकि हमारी संस्कृति में ये एक आवश्यक पहलू रहा है।
अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष डॉ बी पी सिंह गौर ने वेबिनार के विषय का प्रवर्तन करते हुए कहा कि संस्कृति मनुष्य को स्थानीय आवश्यकताओ के अनुसार महामारी व बीमारी से लड़ने के लिए तैयार करती है और साहित्य उनसे लड़ने के लिए मनोबल प्रदान करता है। साहित्य मनुष्य को इस शाश्वत सत्य से रुबरु कराता है कि आज जो संकट है वह सदैव नहीं रहने वाला है। इससे पहले भी मानव प्लेग,फ्लू व हैजा जैसी महामारी का सामना कर चुका है।केवल भारत में उस समय 15 लाख लोग इस महामारी से मारे गए थे।प्रसिद्ध हिंदी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की पत्नि एवम पुत्री की मृत्यु महामारी से हुई थी। इस महामारी से सर्वाधिक प्रभावित और प्रताड़ित होने वाला वर्ग प्रवासी श्रमिक है | हमने प्रवासी श्रमिकों को भूंखे ,नंगे पांव महानगरों से उनके गांव लौटते हुए देखा है | उनमें से कई कभी अपने गांव नहीं लौट पाए , जिंदगी ने धोखा दे दिया।
इस विमर्श को आगे बढ़ाते हुए त्रिभुवन विश्वविद्यालय , काठमांडू में अंग्रेजी के प्राध्यापक प्रो आनंद शर्मा ने कहा कि मानवीय संवेदनाओं पर इस महामारी ने गहरा प्रहार किया है | मानवीय संवेदनाएं एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के समीप लाती हैं जिससे वह एक दूसरे के दया,करुणा ,सांत्वना के भाव को बांटता है किन्तु इस महामारी ने इन संवेदनाओं के स्थान पर संदेह की दीवार खड़ी कर दी है , फलतः एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को कोरोना वाहक के रूप में देखता है |
डॉ निवेदिता मैत्रा, विभागाध्यक्ष ,अंग्रेजी ,डॉ हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय,सागर ने विस्तार से अपनी बात संस्कृति,साहित्य एवं राष्ट्रवाद पर रखी।
डॉ प्रवीण कुमार अंशुमान ,करोड़ीमल महाविद्यालय ,दिल्ली ,डॉ डीनाली फर्नांडो ,केरालिया विश्वविद्यालय ,श्री लंका ने भी वेबिनार के विषय पर अपने विचार व्यक्त किये।
वेबिनार के मॉडरेटर का दायित्व डॉ दुर्गावती ने संभाला एवं विभिन्न सत्रों का सञ्चालन डॉ गायत्री,डॉ आर डी अहिरवार , डॉ डी के प्रजापति एवं डॉ कमलेश चौरसिया ने किया । वेबिनार का समापन डाॅ के बी अहिरवार के धन्यवाद एवं आभार प्रदर्शन के साथ हुआ।


