राजीव शुक्ला "पत्रकार" की कलम से....
भारतीय पुरातन संस्कृति में समय-समय पर धार्मिक आयोजन हवन एवं मंत्रोच्चार ना सिर्फ सामाजिक चेतना को जागृत करता है बल्कि हमारे वायुमंडल एवं वातावरण को भी शुद्ध करने में सहायक साबित होता है, कुछ इसी तरह के कार्यों के लिए इन दिनों छतरपुर जिले के गंज के समीप गढा़ बागेश्वर धाम अपने इन धार्मिक कार्यों के साथ सामाजिक कार्यों का निर्वहन कर रहा है जिसके लिए गढ़ा बागेश्वर धाम के संत श्री धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी अपनी पूर्ण इच्छाशक्ति के साथ कार्यों को संपादित कर रहे हैं ।
संत समाज का आईना व मार्गदर्शक होता है, संत वही जो सर्व समाज के हित में कार्य करते हुए बगैर किसी भेदभाव के साथ मानव कल्याण के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दे , ठीक कुछ इसी तरह से अल्प आयु में ही धर्म की राह में चलते हुए गढ़ा बागेश्वर के संत श्री धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी भी ना सिर्फ धार्मिक आयोजनों के साथ इस स्थल को पवित्रता प्रदान कर रहे हैं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारियों के निर्वहन मैं भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, शायद यही कारण है कि कम समय में ही गंज के समीप गढा़ बागेश्वर धाम जिस स्थल को कुछ वर्ष पूर्व कोई नहीं जानता था आज इसकी ख्याति देश दुनिया में है ।
गढ़ा बागेश्वर धाम में अनवरत जारी धार्मिक आयोजनों में देश के प्रसिद्ध संतो की उपस्थिति के साथ प्रवचन माला की एक लंबी श्रंखला, सामाजिक कार्यों के तहत निर्धन परिवारों की कन्याओं का स- सम्मान विवाह उत्सव जिसमें धाम के द्वारा गरीब बेटियों को वह सब प्रदान किया गया जो एक संपन्न परिवार अपनी बेटियों को दान में देता है तथा इन बेटियों को ना सिर्फ ग्रह- उपयोगी सामग्री प्राप्त हुई बल्कि संत श्री का आशीर्वाद तथा अपनत्व प्रेम पाकर यह सभी जोड़े धन्य हो गए व अपनत्व के साथ खुशी के आंसू लिए खुशी खुशी विदा हुए ।
निश्चित रूप से बागेश्वर धाम तीर्थ स्थल ना सिर्फ छतरपुर जिले व बुंदेलखंड के लिए एक उदाहरण बन रहा है बल्कि सभ्य समाज व सामाजिक चेतना तथा धर्म की अलख जगाने का यह महत्वपूर्ण केंद्र लोगों के लिए उदाहरण के तौर पर स्थापित हुआ है, यहां पहुंचने वाला हर वह प्राणी चाहे जिस समाज व धर्म से हो एक अलग ही सुखद अनुभूति की प्राप्ति करता है , हमारे धार्मिक स्थल शक्ति पूंज स्थल होते हैं और जब व्यक्ति शुद्ध भाव के साथ वहां पहुंचता है तो मन में शांति व एक अलग ही ऊर्जा का प्रवाह होता है, अपवाद हर जगह होते हैं वा विवाद खड़ा करने वाले लोग भी बहुत इस समाज में व्याप्त हैं लेकिन सौभाग्य से यह स्थल इन सब चीजों से अभी भी मुक्त है ।
कमी निकालना व मीन- मेख करना मानव प्रवृत्ति है, समाज में बहुत से ऐसे लोग होते हैं जो असहयोग की दूरभावना के साथ सिर्फ कमियां निकाल कर अच्छे कार्यों में बाधा बनते हैं लेकिन हम जब स्व मूल्यांकन करते हैं तब इन लाइनों को जरूर याद करना चाहिए कि-
बुरा जो देखन में चला बुरा न मिलिया कोय।
जब दिल झांका आपना तो मुझसे बुरा ना कोय।।