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मंगलवार, 31 अक्टूबर 2023

कविता- कुछ टूट जाते हैं:- गरिमा जैन उन्मुक्त

 


कुछ टूट जाते हैं..!!

कुछ तोड़ देते हैं..!

हम अपने ही हाथों से..

लकीरें छोड़ देते हैं..!!

करें अच्छा - बुरा जैसा ..!!

सभी हम पर ही निर्भर है..!

कभी सीधी सी जाती ज़िंदगी..

हम उसको.. मोढ़ देते हैं..!!

संवरते हैं.. बिखरते हैं..!!

ये अपने रोज़ ही अरमा..!

हम अपनी नित नई..

उम्मीद से उसे जोड़ लेते हैं..!!

.....और एक बात हमेशा याद रखना कि

सफ़र में गर मुसाफ़िर..!!

न मिले मंज़िल तो कर न गम..!

वो अक्सर हार जाते हैं..

जो मन को तोड़ देते हैं..!!

लेखक- गरिमा जैन"उन्मुक्त"

             दमोह, मध्यप्रदेश


ऐसे ही लेखन नि:शुल्क प्रकाशन के हम तक भेजें। रूपेश जैन 7247230761