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मंगलवार, 10 दिसंबर 2024

बेहतर जलवायु और पर्यावरण मिलना भी मानवाधिकार।

//वंदना जोशी//

नेटवर्क इंदौर। जिस दिन से हम मानव को मानव के रूप में देखने लग जाएगें उस दिन से हमें किसी भी मानवाधिकार की आवश्यकता नहीं होगी। अपने अधिकारों की बात करने के साथ हमें अपने कर्तव्यों की ओर भी ध्यान देना चाहिए। यह बात जीएसीसी की प्राचार्य डॉ. ममता चन्द्रशेखर ने महाविद्यालय में आयोजित परिचर्चा के दौरान कही। प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सिलेंस श्री अटल बिहारी वाजपेयी शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय में करियर सेल व राजनीति विज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वाधान में मानवाधिकार दिवस के उपलक्ष्य में परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा में महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने वैश्विक स्तर पर मानव अधिकार मुद्दे, मानवाधिकार को बढ़ावा देने में प्रौद्योगिकी का उपयोग, जलवायु परिवर्तन और प्रदुषण का मानव अधिकारों पर प्रभाव एवं मानव अधिकार और लैगिक मुद्दे जैसे विषय पर अपने विचार रखे।

दुश्मन नहीं दोस्त बने- परिचर्चा के दौरान अपने अध्यक्षीय भाषण में प्राचार्य डॉ ममता चन्द्रशेखर ने कहा कि इस बात में जितनी सच्चाई है कि इंसान का सबसे अच्छा मित्र एक इंसान ही होता है उतना ही सच यह भी है कि एक इंसान ही इंसान का दुश्मन होता है। इसी दुश्मनी के कारण आज हमें मानवाधिकार जैसे विषय पर बात करनी पड़ रही है। जब हमारा समाज ही हमारे खिलाफ हो जाए तो एक मानवाधिकार ही है जो हमें सहायता पहुंचा सकते है, लेकिन अगर हम एक दुसरे के दोस्त बनकर रहे तो हमें इस तरह के अधिकारों की आवश्यता ही नहीं रहेगी।

दिखावे की बात करते है विकसित देश

परिचर्चा के दौरान विद्यार्थी रक्षा यादव और गौरव सिंह ने कहा कि आज बाग्लादेश, सीरिया, युक्रेन में जो हो रहा है या जो जापान के साथ हुआ इससे स्पष्ट होता है कि विश्व की महाशक्तियां केवल मानवाधिकार की बात तो करती है पर उसके लिए कार्य नहीं करना चाहती वर्तमान में जो विश्वस्तर पर हो रहा है क्या उनमें मानवाधिकार की आवश्यकता नहीं है? लेकिन विकसित देश ऐसे समय में चुप रह जाते है वे मानव अधिकार की बाते कश्मिर में आंतकवादियों को गाड़ी पर बांधने जैसी घटनाओं पर ही करते है। तब उन्हें आतकवाद से बड़ा मानवाधिकार नजर आता है।

विश्व को नहीं अपने घर को देखे

 न्याय, समानता और स्वतंत्रता की बात मानवाधिकार के अंतर्गत की जाती है। जब भी मानवाधिकार की बात होती है हम वैश्विक स्तर पर इसे देखना शुरू कर देते है जबकि पहली जरूरत विश्व को देखने की नहीं हमारे अपने घर को देखने की है। यह बात एमए के छात्र अविनाश पाटिल ने कहीं। उन्होंने कहा कि जब समाज ही खतरा बन जाता है तब हमें मानवाधिकार की आवश्यकता महसुस होती है। हमारे देश में आज महिला, बच्चे और दलित वर्ग को मानवाधिकार की आवश्यकता सबसे अधिक है। समाचार पत्रों में महिलाओं और बच्चों के साथ बढ़ते अपराध दलितों के साथ होने वाले शोषण की खबरे हमें यह सोचने पर मजबुर करती है कि क्या असल जिंदगी में मानवाधिकार का पालन किया जा रहा है? इतना ही नहीं बेहतर जलवायु और पर्यावरण मिलना भी मानवाधिकार के अतर्गत आता है ऐसे में क्या दिल्ली में रह रहे नागरिकों के अधिकारों का हनन नहीं हो रहा है? उन्होंने कहा कि इन सभी मुद्दों पर ध्यान देना आज सबसे ज्यादा जरूरी है। कार्यक्रम की संयोजिका डॉ सध्या गोयल ने मानवाधिकार की आवश्यकता विषय पर अपनी बात रखी और विद्यार्थियों से इस कहा कि वे अपने अधिकारों के प्रति सजग रहे और उन्हें जाने। कार्यक्रम का संचालन प्लेसमेंट अधिकारी कल्पना सक्सेना ने किया। आभार प्रो. हरिश मिमरोठ ने माना। इस मौके पर प्रो. पदमा पटेल, प्रो. फातिमा जमाली, श्याम राठौर एवं बड़ी संख्या में प्रोफेसर व विद्यार्थी उपस्थित हुए।