बुंदेलखंड के इस ग्राम में महिलाओं के हाथ में चप्पल लेकर चलने की प्रथा है प्रचलित।
//रूपेश जैन(7247230761)//
ब्यूरो नेटवर्क। छतरपुर जिला मुख्यालय से करीब 135 किलोमीटर दूर बकस्वाहा जनपद क्षेत्र अंतर्गत ग्राम मानकी है, जो नैनागिरी जैन सम्प्रदाय की धर्मस्थली से लगा हुआ है।
यह गांव बुंदेलखंड की पर्वतमाला में छोटी सी टेकरी नुमा पहा़ड़ी पर वसा हुआ है. जहां पर सभी परिवार आदिवासी सौर समुदाय के निवास करते है।
आमतौर पर तो सभी जगह महिलाओ के साथ भेदभाव देखने को मिल जाता है जिनमे सामाजिक,जातिगत, छोटा-बड़ा ,उॅंच-नीच आदि स्वरूप प्रमुख है।
लेकिन बक्सवाहा के मानकी में एक ही सामुदाय के लोग है जहां पर वर्षो पुरानी चली आ रही इज्जत मर्यादा से जुड़ी परम्परा आज रूढ़िवादी परम्परा में तब्दील हो चुकी है। इसमें अब कोई महत्वपूर्ण तथ्य नही है कि मर्यादा का उलंघन चप्पल पहनने से हो जायेगा।
क्योंकि मानकी में स्थानीय महिलाओं के गांव में बिना चप्पल का प्रवेश प्रचलित है। तो वही साथ में चल रही गांव की बेटी के उपर यह नियम लागू नही होता है।
"हारखेत में जाते है तो चप्पल पहन लेते है, गांव के अन्दर वस्ती में मर्यादा के कारण नही पहने ते, गांव की कोई महिला नही पहनती है।”
ग्रामीण महिला - देशरानी आदिवासी (सौर)
महिलाओ के चप्पल न पहनने की चर्चा के बीच पड़ोस के गांव पुजारी ,आ गये उनका कहना था की ये पुरानी प्रथा है ,यह अपने बजुर्गो का सम्मान है होना ही चाहिये ,लेकिन संस्था के साथियो ने पुजारी जी को समझाया तो दुवारा उन्हाने ही श्रीकृष्ण भगवान की एक कहानी सुनाई जिसमें कृष्ण भगवान के सिर में दर्द था गोपियो ने बहुत ईलाज किया लेकिन भगवान ने कहा की राधा के पाव में जो महाउर लगा है वही सिर में लगा दे दर्द मिट जायेगा। ऐसा वर्णन है, इसके बाद पुजारी रामदास ने कहा की ये गलत है पहले और आज में बहुत बदलाव भी हुआ सड़क गिटटी की है जो जलती है तथा सड़क पर कंकर ,पत्थर, कांच के टुकड़े इत्यादि होते हैं चप्पल सब को पहना चाहिये।
"महिलाएं गांव में अपने से बड़ो का सम्मान करती है लेकिन आज के समय में यह ठीक नही है हम सभी के साथ वैठक कर इस कुप्रथा मैं सुधार लाएंगे।"
भगवानदास (पुजारी रामकुण्ड जमुनया)
बदलाव की पहली कड़ी बनने को तैयार हुए पुजारी भगवानदास एवं ग्रामीण-गांव के फेरन सिंह एवं पुजारी भगवान दास एवं हुन्डीवाई सौर ने कहा की हम गांव में मीटिंग कर सभी को जागरूक करने का काम करेगे एवं इस रूढिवादी परम्परा को ठीक करेगे।
यह परम्परा महिलाओ के लिये बनी है, जो समाज में जेंडर समानता की पोल खोलती है जो महिला-पुरूष के बीच भेदभाव पैदा करती है। इसका असर महिलाओ के स्वास्थ्य एवं मन पर भी पड़ता है जिससे वे अपने को कमजोर एवं आने वाली पीढ़ी को भी सक्षम नही बना पा रही है। महिला हिंसा का यह एक रूप ही जिसे मानसिंक एवं शारीरिक हिंसा कहा जा सकता है।
तथा इस बैठक में महिला समानता एक अहम चर्चा का विषय बनी रही सुबह से शाम तक चली इस बैठक में आखिरकार लोगों ने माना की महिलाओं के साथ यह सम्मान नहीं बल्कि उनके प्रति अपमान की भावनाओं के साथ यह सब सहना पड़ता है। ऐसी परंपराओं को हम समाज से उखाड़ फेंकने के लिए आज से प्रतिबध और शपथ पूर्वक यह आश्वस्त कराते हैं कि आने वाले समय में इस तरह की परंपराओं को बढ़ावा नहीं देंगे।