द्रोणगिरि बार्षिक मेले का हुआ शुभारंभ।
संवाददाता अक्षय जैन जादू की रिपोर्ट.....
भगवा/द्रोणगिरि(छतरपुर)। पावन लघु सम्मेद शिखर गुरूदत्तादि 8.5 करोड़ मुनिराजों की निर्वाण स्थली सिद्ध क्षेत्र द्रोणगिरी मैं प्रतिबर्षानुसार इस बर्ष भी माघ शुक्ल त्रयोदशी से पूर्णिमा तक बार्षिक मेला का आयोजन बड़ी धूमधाम के साथ किया जा रहा है।इस अवसर पर चौबीस तीर्थंकर महामण्डल बिधान का आयोजन बिधि बिधान पूर्वक किया जायेगा मेला शब्द का शाब्दिक अर्थ तो आयोजन होता है यदि हम इस आयोजन के व्यवहारिक पक्ष को देखे तो ज्ञात होता है कि आपस मे एक दूसरे से मिलना,वार्तालाप करना,सम्बन्धों को मजबूत करना आदि लेकिन यदि इसे पारमार्थिक दृष्टि से देखे तो ज्ञात होता है कि मन के मेल को अर्थात राग द्वेष आदि से निर्वृत्त होना, संसार के समस्त प्राणियों से मिलने का नाम आत्म कल्याण नहीं, बल्कि अपनी आत्मा का आत्मा से मिलन होना, संसार के समस्त चराचर पदार्थों को हेय समझने से है पर से निज की और परिणति को लाने का नाम वास्तविक मेला है। तीर्थ यानी जिस स्थान से तरा जाये, संसार सागर से पार हुआ जाये सच्चे सुख का आभास किया जाये उसे प्राप्त करने के उपाय किये जायें उसे हम तीर्थ कहते है और तीर्थ तीन प्रकार के होते है सिद्ध क्षेत्र, अतिशय क्षेत्र, कल्याणक क्षेत्र और क्षेत्रों पर हम पवित्र भावना लेकर आते है पापों का प्रक्षालन करने के उद्देश्य से आते है क्योंकि तन् की पवित्रता बाह्य पदार्थों से नहीं वल्कि प्रभु नाम स्मरण से, गुणाराधन से, निज ध्यान से, आत्म ध्यान से ही आती है मन मे मंत्र लगाने से आती है जिन दर्शन से निज दर्शन कर आत्मा के हित को प्राप्त करना सच्चे सुख को प्राप्त करने का नाम मेला है।