कक्षा 3 के बच्चे को 4900 रुपए की 23 किताबें पढ़ा रहे स्कूल।
कलेक्टर, डीईओ की उदासीनता से निजी स्कूलों में किताबों के नाम पर मचाई लूट।
अभिभावकों के भारी विरोध के बाद भी नहीं थम रहा लूट का कारोबार।
ब्यूरो छतरपुर। जिले में निजी स्कूलों द्वारा किताबों के नाम पर अभिभावकों से की जा रही लूट का कारोबार दिन-प्रतिदिन फल-फूल रहा है। एक अप्रैल से स्कूल खुल चुके हैं। स्कूल खुलते ही बच्चों पर किताबें खरीदने का दबाव बनाया जा रहा है। इन बच्चों की जिद के कारण अभिभावकों को स्कूल के दलाल बुक सेलर से ही किताबें खरीदनी पड़ रही हैं। कक्षा 3 में पढऩे वाले एक बच्चे की किताबों का बिल सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस बिल में उल्लेख है कि कक्षा 3 की 23 किताबों का मूल्य 4 हजार 900 रुपए है। अब सवाल यह उठता है कि तीसरी के बच्चे को 23 किताबें पढ़ाकर खुले आम एनसीईआरटी के नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले इन निजी स्कूलों पर कलेक्टर मोहित बुंदस और जिला शिक्षा अधिकारी संतोष शर्मा आखिर इतने मेहरबान क्यों हैं?
एक सप्ताह पहले भी लगभग 50 अभिभावक और कई जागरुक नागरिकों के साथ पत्रकारों ने जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय पहुंचकर स्कूलों द्वारा की जा रही इस लूट का विरोध किया था। इसके बाद जिला शिक्षा अधिकारी स्कूलों को पत्र लिखकर उनके किताब प्रकाशन और फीस आदि के दस्तावेज तो मंगा लिए लेकिन इनको पढ़कर स्कूलों को कोई फौरी निर्देश नहीं दिए। जैसे-जैसे जिला शिक्षा विभाग स्कूलों को समय दे रहा है। वैसे-वैसे बच्चे सिलेबस निकलने के डर से किताबें खरीदने की जिद कर रहे हैं और अभिभावकों को ये मंहगी किताबें खरीदनी पड़ रही हैं।
किताबों के हर सेट पर 50 प्रतिशत कमीशन कमा रहे स्कूल।
सूत्रों के मुताबिक बच्चों को जबरदस्ती थमाई जा रहीं इन किताबों की मंहगी कीमत का 50 फीसदी हिस्सा स्कूल के मालिकों को जा रहा है। देखा जाए तो हर बच्चे पर एक हजार से 3 हजार तक का कमीशन कमा रहे ये स्कूल प्रतिवर्ष 10 से 15 लाख रुपए सिर्फ किताबें बेचकर छाप रहे हैं। इन किताबों में न तो एनसीईआरटी की गाइड लाईन फॉलो की जा रही है और न ही किताब की मोटाई उसकी कीमत के साथ न्याय करती है। कम पन्नों की किताबें भी ढाई सौ से तीन सौ रुपए तक की बेची जा रही हैं। सीबीएसई की गाइड लाइन के पालन का दिखावा करते हुए स्कूलों ने अपनी किताबों के विक्रय के लिए बाजार में दलाल बुक सेलर फिक्स कर लिए हैं। कुछ स्कूल तो अपने दूसरे आवासों के माध्यम से किताबें बेच रहे हैं। जिला शिक्षा अधिकारी संतोष शर्मा को इस मामले की पूरी जानकारी है फिर भी वे कोई कार्यवाही नहीं कर रहे हैं।
क्या कहती है एनसीईआरटी की गाइडलाइन।
स्कूलों की शैक्षणिक व्यवस्थाओं को नियंत्रित करने वाली संस्था एनसीईआरटी की गाइड लाइन के मुताबिक निजी स्कूल अपने स्कूलों में एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित किताबों को ही चलाएंगे। यदि किसी विशेष पुस्तक को लागू करना है तो इसकी जानकारी जिला शिक्षा अधिकारी को भेजी जाए। पुस्तकों की संख्या भी प्राइमरी छात्रों के लिए नियंत्रित रखी गई है। इसके बाद भी ज्यादातर स्कूल निजी प्रकाशकों से कमीशन का समीकरण बनाकर अपने विद्यार्थियों पर थोप रहे हैं। इस खेल में प्रकाशक, स्कूल संचालक और बुक सेलर मिलकर हर अभिभावक से लगभग 50 से 70 फीसदी कमीशन लूट रहे हैं।
पूरे 12 महीने की फीस वसूल रहे स्कूल।
मध्यप्रदेश में शुल्क निर्धारण नीति न होने के कारण जिले के ज्यादातर स्कूल अभिभावकों से साल के 12 महीनों की स्कूल फीस ले रहे हैं। स्कूल संचालकों द्वारा मई और जून की फीस भी अभिभावकों से वसूली जा रही है जबकि इन दो महीनों में अवकाश होता है। अवकाश के महीनों की फीस वसूलकर भी स्कूल संचालक हर वर्ष लाखों की अवैध कमाई में जुटे हैं। स्कूल उन्हें जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में जमा कराए दस्तावेजों में भी साफ उल्लेख किया है कि वे 4 तिमाही में बांट कर पूरे वर्ष की फीस वसूल रहे हैं।
सोमवार को कलेक्ट्रेट में फरियाद लगाएंगे अभिभावक।
छतरपुर के स्कूलों द्वारा की जा रही लूट से परेशान कई अभिभावक सोशल मीडिया पर अपना आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं। जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा कार्यवाही में बरती जा रही ढील से नाराज कई अभिभावक अब सोमवार को कलेक्टर मोहित बुंदस से मुलाकात कर कार्यवाही की मांग करेंगे। प्रशासन ने अगर दो-तीन दिन के भीतर इस पर कोई ठोस कदम उठाया तो ठीक है अन्यथा अभिभावकों का इस वर्ष भी लुटना तय है।
