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शुक्रवार, 22 मई 2020

संपादकीय:- मजदूर क्यों है मजबूर?



रूपेश जैन
छतरपुर,मध्यप्रदेश
7247230761
rupesh7247@gmail.com

कोरोनावायरस वैश्विक महामारी के चलते देशव्यापी लॉक डाउन सक्रिय रुप से लागू है तो वहीं इससे निपटने के लिए भी केंद्र व राज्य सरकारें अपने-अपने दावे कर रही हैं।
लेकिन इसके उलट मजदूर मजबूर है तो वहीं तमाम प्रयासों के बावजूद कोरोनावायरस के पॉजिटिव मामलो में इतना इजाफा आखिर क्यों सामने आ रहा है यह सवाल अभी तक सत्ता के गलियारों में सुलग रहा है, लेकिन वैश्विक महामारी से निपटने के लिए कोरोना योद्धा अपनी जी जान लगाकर काम कर रहे हैं जो कि प्रशंसनीय भी है।
विगत 18 मई से आगामी 31 मई तक के लिए लॉक डाउन 4.0 लागू किया गया है लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही है क्योंकि हर रोज कोरोना के औसतन 4000 से 5000 मरीज सामने आ रहे हैं इन मरीजों की संख्या में हम उस देश से आगे निकल गए हैं जहां से यह बीमारी सर्वप्रथम देखी थी, ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि आने वाले दिन और भी चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं लंबे लॉकटाउन के कारण राहत जैसी कोई उम्मीद की जा सकती थी पर उन पर केंद्र सरकार ने सीधे तौर पर कोई फैसला नहीं लिया है एक दिशा निर्देश के साथ ज्यादातर जिम्मेदारी राज्यों पर सौंप दी गई है अब राज्य तय करेंगे कि लॉक डाउन 4.0 में कितनी ही राहत देनी चाहिए।
लेकिन कोरोना महामारी की गंभीर परिस्थितियों के बीच प्रवासी मजदूरों की समस्या ने भी दूसरा सबसे बड़ा रूप ले लिया है लॉक डाउन के चलते बड़े शहरों में रुके हुए प्रवासी मजदूर परेशान हो रहे हैं इनमें दैनिक वेतन भोगी सहित अन्य मजदूर बड़े शहरों में रोटी खानपान के विकल्प तलाशने में असफल हो रहे हैं और अब देश के प्रवासी मजदूर मजबूर होकर अपने गांव की ओर पलायन करने लगे हैं हालांकि इस स्थिति को जानकार रिवर्स माइग्रेशन भी कह रहे हैं लेकिन आने वाले समय में यह और चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।
हालांकि इस ओर सरकार ने भी अपने प्रयास किए हैं जिनमें श्रमिक एक्सप्रेस के अलावा कई ट्रेनों को चलाने की अनुमति प्रदान की गई है तो वहीं इसके अलावा बस सेवा के जरिए भी मजदूरों को उनके गंतव्य तक भेजा जा रहा है लेकिन सरकारी व्यवस्था का पता ना होने के कारण कुछ मजदूर पैदल चलने के लिए ही मजबूर हो रहे हैं यह स्थिति देश के लिए दुख देने वाली साबित हो रही है।
मजदूरों के वापस अपने अपने ग्राम में लौटने के बाद अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उछाल लाया जा सकता है जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कारण देश की आगामी प्रवृत्ति को बल मिल सकता है।

●  ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल सकता है सहारा।

देश में अधिकतम प्रवासी मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ झारखंड, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से पलायन करके बड़े शहरों की ओर उद्योग धंधों की तलाश में निर्भर हुए हैं लेकिन कोरोना महामारी एवं लंबे लॉक डाउन के चलते इनको अब वापस अपने गांव लौटना पड़ रहा है जिसे अब यह ग्रामीण इलाकों में विकल्प खोज रहे हैं हालांकि अब ऐसे में सरकारों द्वारा सहयोग से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार लाकर इन्हें ऊपर उठाया जा सकता है।
सन 2011 की जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक देश की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या 68.8% ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है तो वहीं नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था करीब 46% राष्ट्रीय आय में योगदान देती है अब अगर सरकार द्वारा यह विभिन्न कार्य किए जाएं तो देश के विकास में ग्रामीण अर्थव्यवस्था कारगर साबित हो सकती है जिसमें प्रमुख है कि खरीदी उपार्जन केंद्रों पर युद्ध स्तर पर कार्य किया जाए जिससे किसानों को उनकी फसल का उचित दाम मिल सके इसके अतिरिक्त विपणन अधिनियम की शर्तों में छूट दी जाए तथा स्वयं सहायता समूहों, सहकारी समितियों मनरेगा के अंतर्गत कृषि प्रवाह, ग्रामीण सड़क के साथ ही खाद्य प्रसंस्करण को बल दिया जाए एवं ग्रामीण इलाकों में उद्योगों के विकल्प खोजे जाएं जिससे आने वाले समय में विभिन्न ग्रामों में बड़े शहरों की ओर होने वाले पलायन को रोका जा सकेगा तो वही ग्रामीण अर्थव्यवस्था के उभरने से राज्य एवं देश की प्रगति को बल मिलेगा।