क्षेत्र की पृष्ठभूमि:- बुंदेलखंड छतरपुर जिला जिसमें 8 विकासखंड है, हम बात कर रहे हैं छतरपुर मुख्यालय से 100 किलोमीटर दूर एक छोटा सा ब्लॉक जो बहुत दूर-दराज का ब्लॉक है यहां के लोगों को प्रशासनिक रूप से आवागमन और शासन की सेवाओं की दृष्टि से बहुत दूर माना जाता है। यह विकासखंड सागर, दमोह की सीमाओं से जुड़ा हुआ है, आमतौर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, आजीविका, रोजमर्या की जरूरतों को पूरा करने के लिए बाजार हाट व मूलभूत सुविधाएं के लिए अधिकतम लोग दमोह व सागर जाते हैं । सिर्फ प्रशासनिक काम काज के लिए लोग छतरपुर जाना पसंद करते हैं। बक्सवाहा से दमोह 55 किलोमीटर एवं सागर 70 किलोमीटर की दूरी पर है। विकासखंड के अन्य ब्लॉक की अपेक्षा बक्सवाहा बहुत ही पिछड़ा है। यहां पर अपनी आजीविका सुनिश्चित करने के लिए बड़ी चुनौतियां हैं लोग अपनी जीविका उपार्जन के लिए पलायन पर कई राज्यों, दिल्ली, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश जाते हैं, लॉक डाउन के दौरान 6000 हजार परिवार वापस आए उनकी स्थिति भयंकर दयनीय चिंता जनक रही है।
बक्सवाहा विकासखंड देश दुनिया में बक्सवाहा के हरे भरे घने जंगल बनाम हीरे की खदान और हीरे की चमक से प्रसिद्ध है, विश्व में सबसे उच्च स्तरीय हीरा बक्सवाहा में पाया जाने का दावा किया जा रहा हैं। बकस्वाहा विकासखंड में 40 ग्राम पंचायतें हैं 131 राजस्व गांव हैं। जहां पर ग्रामीण क्षेत्र की जनसंख्या 90277 एवं शहरी क्षेत्र की जनसंख्या 10216 (शहरी पुरुष 6148 एवं महिला 5108) है, (ग्रामीण क्षेत्र में पुरुष 48285 एवं महिला 41992) है , ग्रामीण क्षेत्र का लिंग अनुपात 870 शहरी क्षेत्र का लिंगानुपात 896 है।
सूखाग्रस्त बुंदेलखंड कई अध्ययन के बाद सामने आया कि बुंदेलखंड सूखाग्रस्त है, यहां पर पलायन भी अधिक मात्रा में होता है । इसकी मुख्य वजह है पानी का ना होना, बिन पानी सब सून है पानी के बिना खेती किसानी, बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां , कंपनियां रोजगार संबंधी अवसर यहां के लोगों को प्राप्त नहीं होते जिसके कारण आर्थिक स्थिति दयनीय और गंभीर बनी रहती है ।बक्सवाहा में मात्र एक नदी है जिसे गैल नदी के नाम से जानते हैं जंगल के बीच से गुजरने वाली नदी को डायवर्ट कर यहां पर बांध बनाकर पानी रोका जाएगा जिससे सीधे तौर पर 5 गांव पानी के लिए दर-दर भटके गे, एसेल माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड बिरला ग्रुप के बंदर डायमंड परियोजना मैं प्रतिदिन एक करोड़ 60 लाख 50 हजार लीटर पानी की प्रतिदिन खपत होगी सूखे की समस्या से ग्रस्त क्षेत्र में इस प्रोजेक्ट के द्वारा भूमिगत जल को भी निकाला जाएगा अब स्थिति कितनी भयंकर हो सकती है इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है, आज की स्थिति में बक्सवाहा में शहरी क्षेत्र में 10216 की जनसंख्या लोगो को नियमित इस्तेमाल और पीने के पानी को खरीद आपनी प्यास बुझा कर अपने जीवन को चला रहे हैं, इस पर भी कहीं ना कहीं ध्यान आकर्षित करने की जरूरत है।
जंगल की चिंता के प्रमुख पहलू सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2 लाख 15 हजार से अधिक पेड़ काटे जाएंगे वास्तविक संख्या अलग हो सकती है, जिसमें 364 हेक्टेयर वन भूमि पर यह उत्खनन किया जाएगा। इन जंगलों में सियार हिरण, बारासिंघा,लकड़बग्घा जंगली सूअर, तेंदुआ,लोमड़ी, लंगूर, गिद्ध, कोबरा, पशु पक्षी और छोटे बड़े अनगिनत जीव-जंतु और प्रजातियां हैं जिनका उल्लेख पहले भी कई अध्ययनों में पूर्व किया गया है इन सब के जीवन पर भी गहरा संकट मंडरा रहा है। 17 गांव के लोग जंगलों से वनोपज, तेंदूपत्ता, महुआ, गुल्ली,चारोली, गोंद, बील, छाल, जड़ी बूटियां इत्यादि से अपना जीवन यापन कर रहे हैं इन पर भी गहरा संकट है। हजारों की तादात में रोजगार छीन कर कंपनी मात्र 400 स्वरोजगार देने की बात कर रही है।
भीमबेटका की तर्ज पर विश्व धरोहर घोषित करने और हेरिटेज बनानी की स्थानीय समुदाय ने उठाई मांग आदिवासी समाज की संस्कृति संरक्षण के साथ बक्सवाहा में स्वरोजगार की असीम संभावना का केंद्र है बक्सवाहा में मिले आदिवासी सभ्यता पाषाण काल युग के शैलचित्र के संरक्षण की बात भी तूल पकड़ चुकी है। अगर इन शैल चित्रों के संरक्षण का कार्य सरकार जिम्मेदारी के साथ करती है तो यह हमारी विश्व धरोहर के रूप में संरक्षित होकर क्षेत्र को विकसित होकर विश्वविख्यात हो जाती जिससे स्वरोजगार के सैकड़ों अवसर और संभावनाएं हमारे सामने होगी।
इसके साथ-साथ बक्सवाहा के कई स्थानों पर भारतीय पुरातत्व विभाग के द्वारा खोज जारी है संभावित सभी जगहों पर टीम द्वारा सर्वेक्षण कर वेरीफाई किया जा रहा है। इसके पूर्व महाराजा कॉलेज के पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर एस.के. छारी ने इन प्राकृतिक शैलचित्रों का अध्ययन कर पर शोध पत्र भी जारी किया है ।
उन्होंने इसकी जानकारी सभी जिम्मेदार लोगों को दी है फिर भी अति प्राचीन धरोहर की उपेक्षा सरकार के द्वारा की जा रही है।
बक्सवाहा की आवाज़ है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सीनियर अधिकारियों से एक बैठक संपन्न हुई जिसमें बक्सवाहा की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के संरक्षण व बक्सवाहा में पाए जाने शैल चित्र और लिपि के अवशेष पाए गए हैं इस हेतु अहम बैठक आयोजित हुई। इन शैल चित्रों को संरक्षित कर दिया जाए तो , स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ेंगे, शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ोतरी होगी देश-विदेश से आने वाले सैलानियों के संपर्क में आने से भाषा पर भी असर पड़ेगा साथ ही साथ गांव के लोग आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेंगे स्वरोजगार और आय के स्रोत का बढ़ना स्वाभाविक है जहां भी इस तरह के विश्व धरोहर हैं वहां होटल, चाय- नास्ता, पान , पानी , भोजनालय, खिलौने की दुकान बुक स्टॉल, गाइड, सिक्योरिटी गार्ड, फल, फूल, इसके साथ ही क्षेत्रीय स्थानीय प्रचलित वस्तुओं का विक्रय विश्व स्तरीय हो जाएगा और बुंदेलखंड के बक्सवाहा का नाम देश दुनिया में जाना जाएगा।