//रत्नेश जैन//
बकस्वाहा(छतरपुर)। जिनवाणी को ही जिनागम कहते हैं और जिनागम में आत्म कल्याण का जो मार्ग बताया गया वह मार्ग अर्थात पंथ ही " जिनागम पंथ " है । भगवान महावीर ने बताया कि वस्तु के स्वभाव का नाम धर्म है वही जैन धर्म है, क्षमा आदि आत्मा के भाव धर्म है, रत्नत्रय जो धर्म है वही जैन धर्म है और जहां जीवो की रक्षा की जाती है वह जैन धर्म है ।
उपरोक्त उदगार बकस्वाहा के पारसनाथ जैन मंदिर परिसर में आयोजित धर्मसभा में ' जीवन है पानी की बूंद ' महाकाव्य के मूल रचयिता, बुंदेलखण्ड गौरव, भावलिंगी संत, राष्ट्रयोगी आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी महामुनिराज ने अपने प्रवचन मे कहें। आचार्य श्री ने कहा कि हमें गौरव होना चाहिए कि हमारे पूर्वजों ने हमें छन्ना प्रदान किया है क्योंकि छन्ना पानी छानने में उपयोग किया जाता है जिससे जैनी दया धर्म का पालन किया करते हैं । यह छन्ना दया रुपी नेत्र हैं, विश्वसनीय जिनसूत्र हैं। आचार्य श्री ने अपनी रचना के अंश " जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाए रे । होनी अनहोनी -हो-हो कब क्या घट जाए रे ।। " तरन्नुम मे लयबध्य सुनाकर सबको आत्मविभोर कर दिया ।
आज मंगलवार को आचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज का ससंघ 25 पिच्छीधारी से अधिक साधु व आर्यिका माताजी सहित विशाल चतुर्विध संघ के साथ यहां पर भव्य मंगल प्रवेश हुआ और इसके साथ ही बम्होरी नैनागिरि की ओर से आचार्य विवुद्ध सागर जी ससंघ ने भी प्रवेश किया, दोनों संघों का परस्पर वात्सल्य मिलन हुआ।
इस अवसर पर श्रमण मुनि श्री विश्वार्म सागर जी महाराज का 9वां मुनि दीक्षा दिवस भी मनाया गया, जिसमें मुनि श्री ने आचार्य श्री का पादप्रक्षालन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। सभा के प्रारम्भ मे मंगलाचरण समाज मंत्री शैलेश शाह एवं संचालन अध्यक्ष राजेश रागी ने किया ।
