प्रकृति के पर्याय से प्रेम कर मनुष्य इंसान से भगवान बन सकता है....आचार्य श्रेष्ठ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दिए उपस्थित मीडिया कर्मियों के उत्तर।
//प्रशांत जैन//
बड़ा मलहरा(छतरपुर)। गत दिवस सिद्धक्षेत्र द्रोणगिरी में ससंघ (16 पिच्छी) विराजमान अंतर्मना आचार्य श्रेष्ठ परम पूज्य 108 प्रसन्न सागर जी महराज ने अपनी मंगल देशना से उपस्थित जन समुदाय को कृतार्थ किया।
आपको जानकारी के लिए बता दूँ की आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महराज का जन्म 23 जुलाई 1970 को हुआ था।
केवल 15-16 वर्ष की उम्र में 12 अप्रैल 1986 को उन्होंने ब्रम्हचर्य व्रत लिया।
केवल मनुष्य को छोड़कर समस्त करते हैं प्राकृतिक विचरण।
उन्होंने अपनी देशना में कहा की समस्त जीव जंतु, पेड़ पौधे,धरती व अम्बर केवल मनुष्य को छोड़कर अपनी प्राकृतिक मुद्रा में ही विचरण करते हैं और सभी की दैनिकचर्या का समय फिक्स है।
केवल मनुष्य ही वो जीवात्मा है जो प्रकृति के नियम को नाकारकर निज आडंबर में मग्न है।
और प्राकृति के नियम को अपनाकर ही जैन साधु अथवा सर्वसंत दिगंबर मुद्रा को धारण किए हैं।
आगे बताते हुए उन्होंने कहा की मनुष्य के जिज्ञासा की न तो कभी पूर्ति हुई है और न कभी होगी।
क्योंकि जिज्ञासा अनंत हैं पश्चात सभी मीडिया कर्मियों का किया गया सम्मान।
आगे आचार्य श्री कहते की मनुष्य को संतुष्टिपूर्वक जीवन के लिए सात नियमों का पालन करना चाहिए।
प्रकृति के पर्याय जीव जंतु,जल थल,पेड़ पौधे, पशु पक्षी,संयम व्रत आदि अपना व इन्हें कोई नुकसान न पहुंचाकर वह मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
लेकिन पाश्चात्य संस्कृति को अपनाकर मनुष्य स्वयं अपने मोक्ष मार्ग में बाधक बना हुआ है।
द्रोणगिरी कमेटी ने छतरपुर से पधारे बंटी जैन के सहयोग से एक प्रेसवार्ता का आयोजन किया।
जहां आचार्य श्री ने उपस्थित मीडिया कर्मियों को अपनी देशना से कृतार्थ किया। समस्त मीडिया कर्मियों को आचार्य श्री द्बारा आशीर्वाद स्वरूप शास्त्र भेंट किए गए। द्रोणगिरी कमेटी द्बारा कार्यालय में तिलक लगा व माला पहनाकर सम्मान किया गया। में सभी मीडिया कर्मियों के एक एक कर उत्तर दिये।
शॉर्ट फिल्म के माध्यम से किया गया आचार्य श्री के जीवन मे घटित विशेष घटनाक्रम का चित्रण।
तत्पश्चात आचार्य श्री ने चौबीसी के नव निर्मित प्रवचन हाल में पुनः अपनी ओजस्वी वाणी से कृतार्थ किया।
इसके पश्चात पूर्व नियोजित शॉर्ट फिल्म के माध्यम से आचार्य श्री के जीवन मे घटित हुए कुछ विशेष वृतांत से सभी को परिचित कराया।
सभी को जैनचर्या पालन के साथ गेट तक मौन रहने का नियम भी दिया।
