रंगों का त्यौहार जिलेभर में धूमधाम से मनाया गया।
//अखंड यादव//
बल्देवगढ(टीकमगढ)। प्रदेशभर के साथ बल्देवगढ़ के बिकास खण्ड में रंगोत्सव का त्योहार मनाया गया।सुबह से ही हुरेयारों की टोली सड़कों पर रंग-गुलाल लेकर निकली।
टीकमगढ़ जिले के साथ बल्देवगढ़ शहर में भी होली का उत्साह देखने को मिला।बच्चों में पिचकारी के साथ होली खेलने का उत्साह खूब नजर आया। युवती और महिलाएं भी होली खेलने में पीछे नहीं रहीं। बच्चों के साथ युवाओं की टोलियों, युवतियों के साथ महिलाओं और बुजुर्गो में भी होली का उत्साह नजर आया। बच्चे एक दूसरे पर पिचकारियों से रंग बरसाते नजर आए। और बुरा न मानों होली बोलते नजर आए।
होलिका दहन से लेकर रंग पंचमी तक बुंदेलखंड के गांवों की चौपालों में फाग गायन, होली मिलन समारोह से लेकर अन्य कार्यक्रम होंगें।
इस दौरान भाई-दोज का पर्व और रंग पंचमी महोत्सव भी मनाया जाएगा।
बुंदेलखंड की होली लोगों को पर्यावरण संरक्षण और लोक संस्कृति के संरक्षण का संदेश देती है। बुंदेलखंड इलाके में फागुन के महीने में गांव की चौपालों में फाग की अनोखी महफिलें जमती हैं जिनमें रंगों की बौछार के बीच गुलाल-अबीर से सने चेहरों वाले फगुआरों के होली गीत (फाग) जब फिजा में गूंजते हैं तो ऐसा लगता है कि श्रृंगार रस की बारिश हो रही है। फाग के बोल सुनकर बच्चे, जवान व बूढ़ों के साथ महिलाएं भी झूम उठती हैं। फाग सी मस्ती का नजारा कहीं और देखने को नहीं मिलता है। सुबह हो या शाम बल्देवगढ़ बिकास खण्ड गांव की चौपालों में सजने वाली फाग की महफिलों में ढोलक की थाप और मंजीरे की झंकार के साथ उड़ते हुए अबीर-गुलाल के साथ मदमस्त किसानों बुंदेलखंडी होली गीत गाने का अंदाज-ए-बयां इतना अनोखा और जोशीला होता है कि श्रोता मस्ती में चूर होकर थिरकने, नाचने पर मजबूर हो जाते हैं।
बुंदेलखंड के बल्देवगढ़ इलाके में फागुन के महीनों में ऋतुराज बसंत के आते ही जब टेसू के पेड़ लाल सुर्ख फूलों से लद जाते हैं, इन्हीं फूलों को तोड़कर लोग रंग बनाते हैं और होली खेलते हैं। लोग भले ही अब रासायनिक रंगों का उपयोग करने लगे हों, लेकिन बुंदेलखंड के कई गांवों में आज भी छोओला के फूलों के रंग से होली होती है। यहां के मंदिरों में अब भी भगवान को छेओले के फूलों के रंग चढ़ाए जाते हें। वहीं गांव-गांव की चौपालों में बुंदेलखंड के मशहूर लोक कवि ईसुरी के बोल फाग की शक्ल में फिजा में गूंजकर किसानों को मदमस्त कर देते हैं।
आधे बुंदेलखंड में दूसरे दिन होती है होली:
टीकमगढ जिले के कई लोग पिकनिक पर जाते हैं। भाई दोज से लेकर रंग पंचमी तक लगातार होली खेली जाती है।
कुछ खास होती है यहां की होली
बुंदेलखंड की होली अपने आप में सबसे अनूठी रही है। ईसुरी का फाग गायन व फूलों की होली की अब केवल यादें ही शेष रह गई है। समय के साथ बदलाव आने के बाद भी यहां के ग्राम्य जीवन में आज भी पारंपरिक पर्व रचा-बसा है। होली पर गुजिया का स्वाद, भाग की ठंडाई और नाच-गाना अब भी लोगों के बीच लोकप्रिय हैं।
साहित्यकार बताते हैं कि बुंदेलखंड में पर्वो को सांस्कृतिक महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यहां होली पर्व की छटा तो फाल्गुन से शुरू हो जाती है। विशेषकर इस दौरा में शादी विवाहों का आयोजन हो तो विदाई के पहले जमकर होली खेली जाती रही है। गांवों में यह परंपरा आज भी बदस्तूर जारी है। होलिका दहन में प्रत्येक परिवार के लोग पुराने दौर में लकड़ी की होली जलाने के लिये देते थे। जिसमें पूरे मुहल्ले के लोग उमड़ते थे। रासायनिक रंगों के बजाय फूलों या महावरी रंगों का होली खेलने में इस्तेमाल होता रहा है। एक ऐसा दौर भी आया जब होली के साथ-साथ मस्ती के नाम पर चलन भी बढ़ा। समूचे बुंदेलखंड में दोज पर्व के दिन होली खेली जाती है। इस मौके पर होली का उत्साह देखते ही बनता है। ऐसे में यदि होली के साथ गुजिया का करार स्वाद, हंसी ठिठोली, परिहास व भांग की तरंग हो तो होली का मजा कई गुना बढ़ जाता है। किसानों का पूरा वक्त इन दिनों खेतों में व्यतीत होता है।
ऐसे में किसानों को भी पर्व के बहाने ही सही थोड़ा मौका राहत व सुकून का मिलता है।बल्देवगढ़ विकासखंड के गांव में होली का पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है बल्देवगढ़ क्षेत्र के गांव राजनगर में पंचमी को और सुजानपुरा में दोज को कर्मसन घाट मंदिर मैं रंग पंचमी को फाग मनाई जाती है।

