बुंदेलखंड के प्रमुख स्थानो मे सबसे अलग है यह स्थान।
भीमकुंड एक ऐसा प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है जो अपनी औलोकिकता के लिए है मशहूर।
//रूपेश जैन//
बकस्वाहा(छतरपुर)। बुंदेलखंड के क्षेत्र मे आने वाला भीमकुंड, जिले छतरपुर के बकस्वाहा से महज बीस किलोमीटर दूर स्थित है।जहां पर देखने योग्य एक खास बात यह है कि इस स्थान पर एक ऐसा अद्भुत जल कुंड है जो शुरूआत से ही भू वैज्ञानिको के लिए विभिन्न जिज्ञासाओ का विषय बना हुआ है।
अगर कुंड को ऊपर से देखे तो ये कुंड 50 से 70 फिट तक चौड़ा दिखाई देता है।
खोजकर्ताओ ने भी इस जल कुंड की गहराई मापने में कोई कसर नही छोडी।
खोजकर्ता कई बार गोताखोरी करवा चुके है लेकिन इसकी गहराई अभी तक कोई भी नहीं पा सका है।
रहस्यमय है बनाबट।
यहां पर एक जल कुंड है इस जल कुंड की बनाबट ऐसी एक काट की तरह है जो पहाड़ पर एक गुफा के अंदर है,जिसमें ऐसा कटाव है कि सूर्य की आने वाली किरणे कुंड के पानी पर पड़ती है जिससे कुंड का पानी कई रंगो की तरह चमकता है।
तो इसके अलावा एक आश्चर्य की बात यह भी है कि साधारण रूप मे आपने देखा होगा कि जब कोई इंसान पानी में डूब कर मर जाता है तो कुछ समय बाद उसकी बॉडी पानी के ऊपर आ जाती है लेकिन इस कुंड में डूबने वाले का मृत शरीर कभी ऊपर नहीं आता बल्कि वो इंसान हमेशा के लिए गायब हो जाता है।
लोगो के है विभिन्न मत।
तो यहां पर लोगो का भी एक अपना मत सामने आता है कि जब भी कोई नेचुरल आपदा या सुनामी आने वाली होती है तो इस कुंड का जल स्तर ऊपर की ओर बढ़ने लगता है जिससे यहां के लोग प्राकृतिक आपदा का पहले ही अनुमान लगा लेते है।क्योकि बीते समय पहले नेपाल और गुजरात में आये भूकंप के दौरान भी यहां का जल स्तर ऊपर की ओर बड़ा था और जब 2004 में सुनामी आई थी तो उस दौरान तो कुंड में करीब 15 मीटर तक ऊंची लहरे उठी थी जिसके बाद यह कुंड देश-विदेश की मीडिया की सुर्खियों का भी विषय बना रहा। भीमकुंड की गहराई आज भी रहस्यमय बनी हुई है आज तक इसकी गहराई कोई नहीं माप सका कई लोगो ने कई तरह इसकी गहराई नापने की कोशिश की पर उनको सिवाय असफलता के कुछ नही मिला।
माना तो यह भी जाता है कि जहां कुंड है वो जमीन के अंदर बहती तेज धारा के कारण बना है पर इसके बारे में आज तक कोई साइंटिस्ट या रिसचर्स ये पता नहीं कर सका कि आखिर ये जल धारा किस वाटर श्रोत से जुड़ी हुई है।
सुनामी के समय इसमें लहर उठने के बाद डिस्कवरी चैनल की टीम इसका रहस्य जानने आई थी उनके गोताखोरों ने इस कुंड में गोता लगाये पर वे न तो इसकी गहराई नाप सके और न ये पता कर सके की यहां सुनामी के समय लहरे उठने का क्या कारण था।
हालाकि उन्हें गहराई में कुछ विचित्र और लुप्त जलीय जीव जन्तु देखने को जरूर मिले थे कहा जाता है कि जब गोताखोर इस कुंड में 80 फिट की गहराई में पहुंचे तो उन्हें तेज जल की धाराएं बहती मिली जो उसे शायद समुद्र से जोड़ती है डिस्कवरी चैनल ने अपनी जानकारी के निष्कर्ष स्वरूप बताया कि पानी की गहराई में दो कुंड है एक से पानी निकलता है और दूसरे में जाता है जिसके कारण तेज बहाव रहता है इस कुंड का जल स्तर कभी कम नहीं होता है।
एक बार भारतीय सेना के नौ गोताखोरों ने इसकी गहराई नापने का प्रयास किया लेकिन वे भी असफल रहे तो यही नहीं 1977 में जिला प्रशासन ने यहां पर एक साथ तीन पम्प लगाकर इस जल कुंड को खाली कराने का प्रयास भी किया लेकिन लगातार सात दिन तक चले इस काम में कुंड का पानी एक इंच भी कम नहीं हुआ।
यह है यहां का इतिहास।
अब अगर ऐतिहासिक साहित्य दर्शन के अंन्तर्गत अध्ययन करे तो पुरानी कहानियों मे भीमकुंड का संबंध महाभारत काल से है अज्ञातवास के दौरान पांडवो के लिए जंगल और पहाड़ी आश्रय हुआ करती थी कई दिनों से कोई जलाशय न मिलने के कारण एक दिन उनके पास पानी खत्म हो गया इसी बीच पहाड़ पर पहुंचने के बाद द्रोपदी को प्यास लगी तो उन्होंने पानी पीने की इच्क्षा जताई लेकिन दूर दूर तक कोई जलश्रोत नहीं था।
भीम ने अपनी गधा से प्रहार किया तो पहाड़ के बीच की जमीन धस गई और पानी की कई धाराये फूट पड़ी अतः भीम द्वारा बनाए जाने के कारण ही इस कुंड का नाम भीमकुंड पड़ा
कुंड की खासियत यह है कि इसका पानी हमेशा ही साफ और नीले रंग का पारदर्शी दिखाई देता है जिसकी वजह से काफी गहराई तक की चीजे साफ नजर आती है कहा जाता है कि इस कुंड का पानी हिमालय के पानी जैसी गुणवत्ता वाला मैनुरल वाटर है लोग इसका जल बोतलों में भर कर अपने साथ ले जाते है।
प्रतिवर्ष लगता है मेला।
जनपद क्षेत्र बकस्वाहा स्थित भीमकुंड मे जनवरी मे मकरसंक्रति के समय मेला भी लगाया जाता है क्योकि कुछ लोग अपनी आस्था अनुरूप इस कुंड के पानी मे डुबकी लगाना पवित्र मानते है
तो वही सुबह पवित्र जल से स्नान के बाद ही संक्राति के त्यौहार की शुरूआत की जाती है।