Translate

रविवार, 7 जुलाई 2019

संपादकीय: संस्कृतियों को छोड़ मजबूर हुई रीतियां।

संपादकीय: संस्कृतियों को छोड़ मजबूर हुई रीतियां।



      // रूपेश जैन//

युवा पत्रकार/सामाजिक कार्यकर्ता

लेख-  एक वह भी समय था कि जब यह देश सिर्फ सोने की चिड़िया कहा ही नहीं बल्कि माना भी जाता था लेकिन अच्छाई आखिर वर्दाश्त किसे होती है तथा आगे चलकर अंग्रेजी हुकूमत ने सिर्फ व्यापारिक उद्देश्य से भारत में अपने कदम बढ़ाए हुए थे लेकिन इस देश में उन्नत कृषि,हिंदू-मुस्लिम भाईचारा,संस्कृतियों की एकरूपता के अलावा ईमानदार किसान से प्रभावित होकर अंग्रेजी हुकूमत ने अपनी जड़ें गहरी कर ली और भारत में अंग्रेजी हुकूमत ने अपना शासन बना लिया और समय वह ही था कि जब से इस देश में काल के रूप में सवार हुई अंग्रेजी शासन से यहां के रहन-सहन पहनावे बोलचाल के परिवर्तन के अलावा आपसी भाईचारे तथा एकता में भी जाहर खोला गया।
जिसके पश्चात स्वतंत्रता के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने भारत से अपना शासन तो हटा लिया मगर पश्चिमी सभ्यता ने अपना चोला ओढ़ लिया और जो आगे चलकर यहां की दूसरी संस्कृति में परिवर्तित हो गई अतः पश्चिमी सभ्यता के आगमन के बाद रहन-सहन मे भी परिवर्तन सामने आया तो हिंदू-मुस्लिम बंटवारा भी दिखलाई दिया तथा परिवर्तन और पश्चिमीकरण के वेश में देश अपनी प्राचीन काल से चली आ रही संस्कृतियों से अलग होता गया अतः अब इन्हीं बदलती संस्कृतियों का परिवर्तन अब भी साफ रूप में देखा जा सकता है।
लेकिन प्रमुख रूप से फर्क इतना ही है कि तब हुकूमत अंग्रेजी शासन की थी जिससे उनके द्वारा फूट डालो और राज्य करो की नीति ही स्पष्ट होती थी तो वही उसका ही क्रियान्वयन आज राजनीति में भी साफ ढंग से देखा जाता है क्योंकि साधारण रूप से देखने में यही सामने आता है कि राजनीति धर्म की मात्र सिर्फ कसौटी है क्योंकि बीते कई सालों से राम मंदिर आज भी एक राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है हालांकि अब उम्मीद भी है क्योंकि यह मुद्दा सिर्फ राजनैतिक मुद्दे से परे होकर माननीय उच्च न्यायालय के दायरे में पहुंच गया है।
अतः कहना और यह भी कम नहीं है पश्चिमीकरण की सभ्यता ने आज अपनी ही पैठ कुछ इस तरह से जकड़ ली है कि अब पुरानी संस्कृतियों और सभ्यताओ की भी विलुप्ति ही सामने आने लगी है जिससे यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि संस्कृतियों को छोड़कर आज रीतियां नए चाल-ढलन में ढलने के लिए मजबूर हो रही है।