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मंगलवार, 1 सितंबर 2020

जैन धर्मावलंबियों के दस दिवसीय पर्युषण पर्व धार्मिक प्रभावना के साथ हुई संपन्न...विगत में हुई भूलों के लिए मना रहे है क्षमावाणी।


नेटवर्क छतरपुर। जैन धर्मावलंबियों द्वारा   आत्म आराधना का  दस दिवसीय   पर्यूषण पर्व इस वर्ष शासन एवं नगर में चातुर्मास कर रहे पूज्य मुनि संघ के निर्देशानुसार सभी नियमों का पालन करते हुए पूरी धार्मिक प्रभावना के साथ मनाया गया। ज्ञातव्य है कि आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी महाराज के सुयोग्य शिष्य मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज , मुनि श्री अप्रमित सागर जी महाराज ,मुनि श्री सहज सागर जी महाराज का चातुर्मास छतरपुर नगर में होने से  पर्युषण पर्व का उल्लास और भी बढ़ गया था।

    जैन समाज के प्रो. सुमति प्रकाश जैन के अनुसार जैन  धर्मावलंबी प्रति वर्ष भाद्रपद पंचमी से अनंत चतुर्दशी तक पूरे नियम, संयम और धार्मिक विधि विधान से दस दिवसीय पर्युषण  पर्व  मनाते हैं। इस वर्ष पर्युषण  पर्व 23 अगस्त से प्रारंभ हुए थे जो आज मंगलवार 1 सितम्बर को सोल्लास सम्पन्न हो गए। अब व्रतों की समाप्ति के बाद जैन बन्धु अपने जैन एवं अजैन परिचितों से विगत में जाने एवं अनजाने में हुई गलतियों के लिए निर्मल मन से क्षमायाचना कर क्षमावाणी पर्व मना रहे हैं।

         इस वर्ष कोरोना काल में पूज्य मुनिश्री के निर्देशानुसार पर्युषण पर्व पर श्रद्धालुओं ने घर में ही मनोयोग पूर्वक भक्तिभाव और धार्मिक प्रभावना के साथ श्री जी का पूजन एवं अन्य धार्मिक क्रियाएं की,ताकि इस महामारी से बचा जा सके।

         पर्युषण पर्व के दस दिनों के दौरान धर्म के दस लक्षणों को क्रमशः मनाया जाता है।  धर्म के ये दस लक्षण उत्तम क्षमा धर्म , उत्तम मार्दव धर्म , उत्तम आजर्व धर्म , उत्तम शौच धर्म, उत्तम सत्य धर्म , उत्तम संयम धर्म ,उत्तम तप धर्म ,उत्तम त्याग धर्म उत्तम आकिंचन धर्म, उत्तम ब्रहचर्य धर्म होते हैं, जिनका पालन कर हम आत्म आराधना करते हैं।इस प्रकार इन दस पर्वों को पर्युषण पर्व के रूप में जैन समाज के बन्धु बड़े धूमधाम से मनाते और जीवन में उतारने का प्रयास करते है।

      दशलक्षण पर्व के दसवें एवं अन्तिम दिन आज उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म मनाया गया। ब्रह्म अर्थात निज शुद्धात्मा मे जमना ,रमना ही ब्रह्यचर्य है । निज आत्मा मे लीनता ही ब्रह्मचर्य है व्रतो मे सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मचर्य ब्रत का जो पालन करते है , वह अतीन्द्रिय आनन्द को प्राप्त करते है । " ब्रह्म भाव अन्तर लखो" इसी भावना के साथ उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म प्रकट हो, ऐसी भावना रहती है।