//राजेश जैन रागी बकस्वाहा//
18 मार्च के शुभ दिन आचार्य श्री विद्यासागर जी मुनिराज ने अपने कर-कमलों से प्रथम चेतन कृति का निर्माण किया था , बुन्देलखण्ड में आचार्य श्री ने 20 वीं सदी में प्रथम बालयति मुनि दीक्षा प्रदान की थी , इस दीक्षा का वर्णन प्रत्यक्षदर्शी पूज्य मुनि क्षमासागर जी महाराज ने आत्मान्वेषी कृति में किया है । आइए जाने पूज्य मुनि श्री के शब्दों में संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज के द्वारा प्रदत्त प्रथम मुनि दीक्षा का वर्णन।
आचार्य महाराज अपने संघ सहित द्रोणगिरि में विराजित थे , बड़ी मनोरम जगह है , सिद्धक्षेत्र है , पर्वत पर प्राचीन जिनालय हैं , नीचे तलहटी में व्रती-आश्रम व चौबीसी मन्दिर है । वर्णीजी ने कभी इसे "छोटा सम्मेद-शिखर" कहा था । आचार्य महाराज सहित सारा संघ पर्वत पर ही आत्म-साधना में लीन रहता था। आहार चर्या के लिए नीचे आना और चर्या के उपरान्त वापिस पर्वत पर लौट जाना , रोज का क्रम था। आचार्य महाराज ने यहीं रहकर प्रतिदिन तपती दुपहरी में तीन-तीन घण्टे शिलातल पर सूर्य की प्रखर किरणों के नीचे बैठकर ध्यान किया और सारे संघ को साधना के साथ-साथ अध्यात्म की शिक्षा भी दी।
उन दिनों संघ में आचार्य महाराज के साथ हम सभी ऐलक क्षुल्लक ही थे। अभी मुनि-दीक्षा किसी को नहीं मिली थी। एक दिन सुबह अचानक मालूम पड़ा कि ऐलक श्री समयसागर जी केशलुंचन कर रहे हैं। हम सब सोच में पड़ गए कि बात क्या है ? अभी बाल बहुत छोटे हैं, दो माह भी पूरे नहीं हुए , पर अगले ही क्षण हम निश्चिंत होकर अपने ध्यान-अध्ययन में लग गए और सोचा कि जो भी होगा सामने आएगा। असल में, आचार्य महाराज के साथ यही तो मजा है का भविष्य में क्या होगा, इस चिन्ता से मुक्त रहकर वर्तमान में जीने की शिक्षा मिलती है। तब जो भी होता है, सुखद होता है।
लगभग नौ बजे अत्यंत सादगी से, बिना किसी आडंबर व प्रदर्शन के, आचार्य श्री के द्वारा प्रथम मुनि दीक्षा सम्पन्न हुई। हम सभी ने आचार्य महाराज द्वारा दीक्षित प्रथम निर्ग्रन्थ श्रमण मुनि समयसागर जी की चरण वंदना की और अत्यन्त आत्म-विभोर होकर परस्पर चर्चा में लग गए। इतने में आचार्य महाराज स्वयं आकर हमारे बीच खड़े हो गए और बोले, "क्या बात है ? सभी बहुत खुश हो । " हमने कहा कि "आज बहुत अच्छा लग रहा है , निर्ग्रन्थ होना अत्यंत आनंद की बात है।" वे मुस्करा कर बोले, आत्म-विकास के लिए यही उत्साह कल्याणकारी है। " हम सभी उनकी आश्वस्ति और प्रसाद से आप्लावित हुए।
आज जब कभी वह सब याद आता है तो सोचता हूँ कि दूसरी जीवों के हित का मुख्य रूप से प्रतिपादन करने वाले, आर्य पुरुषों के द्वारा सेवनीय प्रधान निर्ग्रन्थ आचार्य ऐसे ही होते होंगे। वर्षों पूर्व पूज्यपाद स्वामी के मन में ऐसे ही आचार्य की छवि बनी होगी, तभी तो उन्होंने लिखा होगा।