//रत्नेश रागी//
बड़ामलहरा(छतरपुर)। मनुष्य जब जन्म लेता है तो नेत्र (चक्षुओं) के साथ जन्म लेता है, जन्म के साथ जो चक्षु प्राप्त हुए हैं आपका हित में भी कारण हो सकते हैं अथवा वें नेत्र आपका अहित भी कर सकते हैं, किंतु भगवान की वाणी को सुनकर प्राणी को जो धर्म चक्षु / ज्ञान चक्षु प्राप्त होते हैं वह मनुष्यों का हित ही करते हैं, अतः जन्म से प्राप्त हुए नेत्रों को पाकर प्राणियों को ज्ञान चक्षु धर्म चक्षु को प्राप्त करना चाहिए ।
उपरोक्त उदगार बड़ामलहरा में विराजमान बुंदेलखंड गौरव, भावलिंगी संत, राष्ट्रयोगी, आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी महामुनिराज ने अपने प्रवचन में कहे । आचार्य श्री ने धर्मसभा में कहा कि भव भ्रमण के मार्ग अनेक हैं लेकिन भव अर्थात संसार से छूटने का मार्ग एक ही है, वह है- मोक्षमार्ग । वह मोक्षमार्ग कहां प्राप्त होगा, वह मोक्षमार्ग आपको निर्ग्रंथ वीतरागी गुरु के चरणों में ही प्राप्त होगा। आचार्य श्री ने कहा कि आप अपने कुटुंब परिवार के सदस्यों में एक ऐसे व्यक्ति को खोजना जिसने अपने मोह को जीत लिया हो। आप खोजते ही रहोगे किंतु आपको अपनों के बीच में कहीं मोह को जीतने वाला एक ही व्यक्ति नहीं मिलेगा क्योंकि आप जिनके बीच रहते हैं वे सब के सब मोही जीव हैं। इसलिए भैया मैं कहता हूं मोहमार्गी मत बनो , जिनागम मार्गी - जिनागम पंथी बनों ।
पंकज जैन व राजेश रागी ने बताया कि इस मौके पर आचार्य श्री का 25 से अधिक पिच्छीधारियों के साथ नगर बड़ा मलहरा में हुये प्रवेश के समय नवोदित उपाध्याय परमेष्ठी जनसंत मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज ससंघ ने अगवानी की और दोनों संघो का परस्पर वात्सल्य मिलन हुआ।