यह शरीर है किराए का घर: आचार्य आर्जव सागर
रूपेश जैन बकस्वाहा(छतरपुर)| आचार्य आर्जव सागर ने बक्सवाहा में अपनी प्रवचन श्रंखला में बताया
जिसे तुम अपना मान रहे हो वह अपना नहीं है और जो अपना नहीं है उसे तुम अपना मान रहे हो ।
अक्सर आदमी घर, दुकान, फैक्ट्री को अपना मानता है यह मेरी पत्नी है यह मेरा बेटा है यह मेरा पोता है पोती है यह जीवन मेरे हैं यह गाड़ी मेरी है लेकिन क्या कभी सोचा कि यह सब क्या मेरे साथ जाएंगे सब जानते हैं कि संसार की सभी वस्तुएं रिश्ते नाते यहीं छूट जाते हैं लेकिन फिर भी आदमी उन्हीं सब में जीवन पर्यंत उलझा हुआ रहता है अपनी सुख सुविधाओं ऐशो आराम पर गर्व की अनुभूति करता है अपनी शान दिखाने में इतना मदहोश हो जाता है कि सामने वाले को तुच्छ समझने लगता है।
यदि नेता बन गया तो अभिमान में डूब जाता है कोई पद भी मिल गया तो उसका घमंड नहीं छोड़ता अर्थात संसार के सुख वैभव इतने प्रिय लगने लगते हैं उन्हीं से जीवन भर आसक्ति नहीं छूटती। वह भी तब छूटती है जब मौत खींच ले जाती है पर वस्तुओं में ही सारा जीवन निकल जाता है और जो वास्तव में अपनी आत्मा है उसे अपना नहीं मानता जब यह शरीर भी अपना नहीं है तो, तो फिर संसार की अन्य वस्तुएं कैसे अपनी हो सकती हैं और यह शरीर भी किराए का घर है फिर क्यों सांसारिक वस्तुओं का जखीरा बढ़ाने में ही जिंदगी व्यर्थ हो रही है अब तो अंदर की आंखें खोलने का वक्त है जिससे जो सचमुच अपना है उसको संभाल सकें।
सिकंदर ने विश्व विजेता बनने का सपना देखा और लगभग पूरे विश्व में घूमकर धन प्राप्त किया लेकिन जब अंत में वह लौट रहा था तो अचानक वह बीमार पड़ गया और वैद्य ने कहा कि अब तुम ज्यादा देर नहीं जी सकते तो वह बहुत दुखी हुआ उसने सोचा कि मैंने कुछ समय के सुख के लिए जन धन की हानि की। लोगों को बहुत कष्ट पहुंचाया लेकिन अब मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूं जिससे लोग मुझ जैसी गलती ना करें उसने अपने सिपाहियों को बुलाया और कहा कि जब मैं मरूँ तो मेरे दोनों हाथ मेरी अर्थी से बाहर निकाल देना जिससे यह दुनिया समझ जाए की संसार में जो भी आता है मुट्ठी बांधकर आता है और खाली हाथ ही जाता है वह इस संसार से धन का एक तिनका भी अपने साथ नहीं ले सकता इस प्रकार उक्त उद्गार आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज ने बक्सवाहा में चल रही प्रवचन श्रंखला में बताएं कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
यह शरीर है किराए का घर:आचार्य आर्जव सागर
इन दिनो बकस्वाहा मे चल रही है प्रवचन श्रंखला....
धर्मप्रेमी अर्जित कर रहे है धर्म लाभ.....
अक्सर आदमी घर, दुकान, फैक्ट्री को अपना मानता है यह मेरी पत्नी है यह मेरा बेटा है यह मेरा पोता है पोती है यह जीवन मेरे हैं यह गाड़ी मेरी है लेकिन क्या कभी सोचा कि यह सब क्या मेरे साथ जाएंगे सब जानते हैं कि संसार की सभी वस्तुएं रिश्ते नाते यहीं छूट जाते हैं लेकिन फिर भी आदमी उन्हीं सब में जीवन पर्यंत उलझा हुआ रहता है अपनी सुख सुविधाओं ऐशो आराम पर गर्व की अनुभूति करता है अपनी शान दिखाने में इतना मदहोश हो जाता है कि सामने वाले को तुच्छ समझने लगता है।
यदि नेता बन गया तो अभिमान में डूब जाता है कोई पद भी मिल गया तो उसका घमंड नहीं छोड़ता अर्थात संसार के सुख वैभव इतने प्रिय लगने लगते हैं उन्हीं से जीवन भर आसक्ति नहीं छूटती। वह भी तब छूटती है जब मौत खींच ले जाती है पर वस्तुओं में ही सारा जीवन निकल जाता है और जो वास्तव में अपनी आत्मा है उसे अपना नहीं मानता जब यह शरीर भी अपना नहीं है तो, तो फिर संसार की अन्य वस्तुएं कैसे अपनी हो सकती हैं और यह शरीर भी किराए का घर है फिर क्यों सांसारिक वस्तुओं का जखीरा बढ़ाने में ही जिंदगी व्यर्थ हो रही है अब तो अंदर की आंखें खोलने का वक्त है जिससे जो सचमुच अपना है उसको संभाल सकें।
सिकंदर ने विश्व विजेता बनने का सपना देखा और लगभग पूरे विश्व में घूमकर धन प्राप्त किया लेकिन जब अंत में वह लौट रहा था तो अचानक वह बीमार पड़ गया और वैद्य ने कहा कि अब तुम ज्यादा देर नहीं जी सकते तो वह बहुत दुखी हुआ उसने सोचा कि मैंने कुछ समय के सुख के लिए जन धन की हानि की। लोगों को बहुत कष्ट पहुंचाया लेकिन अब मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूं जिससे लोग मुझ जैसी गलती ना करें उसने अपने सिपाहियों को बुलाया और कहा कि जब मैं मरूँ तो मेरे दोनों हाथ मेरी अर्थी से बाहर निकाल देना जिससे यह दुनिया समझ जाए की संसार में जो भी आता है मुट्ठी बांधकर आता है और खाली हाथ ही जाता है वह इस संसार से धन का एक तिनका भी अपने साथ नहीं ले सकता इस प्रकार उक्त उद्गार आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज ने बक्सवाहा में चल रही प्रवचन श्रंखला में बताएं कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
