बिना पुरुषार्थ के कोई सफलता नहीं मिलती :आचार्य श्री आर्जव सागर

रूपेश जैन बकस्वाहा(छतरपुर)| जिंदगी में कोई भी कार्य हुआ है बिना पुरुषार्थ के सफल नहीं हो पाता , केवल नियति पर रहने से काम नहीं चलता। यदि कोई बच्चा कुएं में गिर पड़ा हो तो और उस वक्त कोई यह कहे इसकी नियति में यही लिखा था इसलिए उसे बचाने की कोई जरूरत नहीं है तब आप उस व्यक्ति के बारे में क्या कहेंगे ?उसे ज्ञानी कहेंगे या अन्य? ज्ञानी वही समझा जाएगा जो कि कुएं में गिरे बच्चे को निकालने का हर तरह से पुरुषार्थ करेगा ।पुरुषार्थ किए बिना क्या दुकान से कमाई हो सकेगी? नौकरी पर यदि नहीं गए तो क्या वेतन मिल जाएगा ?रोटी नहीं पकाई तो क्या भोजन संभव है? यानी संसार के जितनी भी अच्छे या बुरे कार्य हैं उन सब में पुरुषार्थ करना पड़ता है तभी वे पूरे हो पाते हैं इसी तरह धर्म ध्यान में भी पुरुषार्थ बहुत जरूरी है बिना पुरुषार्थ के कोई सफलता नहीं है केवल यह कहने से कि जो नियति में लिखा है वही होना है फिर धर्म क्यों करें? यही तो हमारी अज्ञानता का परिचायक है जिस तरह संसार के कार्यों में समझदारी रखी जाती है वैसे ही धर्म ध्यान में यदि विवेक को आगे रखकर सच्ची श्रद्धा ,आस्था और विश्वास के संग पुरुषार्थ किया तो बेड़ा पार हो जाना निश्चित है । ध्यान रखना संसार में जितने भी महान आत्माएं मुक्त हुई है वे सभी पुरुषार्थ करने पर ही पार हो पाई है। अतः सच्चा पुरुषार्थ अपनी आत्मा के लिए अवश्य करें जिससे भव भव की आवागमन से छुटकारा पाया जा सके ।
उक्त उद्गार बकस्वाहा में विराजमान आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज द्वारा दिए गए महाराज जी ने श्रावक के षट आवश्यक में संयम का महत्व बताया और कहा कि हमें अपनी मन ,वचन और काय पर संयम रखना आवश्यक है यदि हम अपने मन वचन और काय का संयम नहीं रखते हैं तो इससे बहुत सी समस्या हो सकती हैं हमें अपने आत्म कल्याण के लिए इन तीनों का समन्वय बनाना आवश्यक है।पाठशाला के बच्चों द्वारा आचार्य श्री का पूजन किया गया ।कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।