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मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

भगवान की साधना में लीन तपस्वनी ने त्याग दिये प्राण।

भगवान की साधना में लीन तपस्वनी ने त्याग दिये प्राण।



●  बुंदेलखंड में कठिन तप की दिखी यह अनोखी मिशाल।


//रूपेश जैन //(7247230761)

बक्सवाहा(छतरपुर)। हाल ही में सोशल मीडिया के व्हाट्सएप, फेसबुक पर एक समाचार अधिक वायरल हो रहा है जो जानकारी तो पूर्णतः सत्य है, जब हमने समाचार सुना तो अत्यंत दुख हुआ क्योंकि समाचार ही कुछ ऐसा था किंतु जब समाचार की सच्चाई जानने का प्रयास किया तो आश्चर्य के साथ धर्म पर श्रद्धा और अधिक बड़ गई बड़ गयी।
जानकारी अनुसार सम्पूर्ण घटना बुंदेलखंड अंचल के छतरपुर जिले के बक्सवाहा अंतर्गत जैन सिद्धक्षेत्र नैनागिर की है जहां आचार्य विद्यासागर महाराज से दीक्षित आर्यिका श्री सुनयमति जी माता जी अपनी तप-साधना कर रही थी प्रतिदिन की तरह वे विगत दिन पूर्व संध्याकाल की सामायिक(भगवान का ध्यान) करने के लिये अपने कक्ष में चटाई लपेट कर बैठ गयी, चूंकि माता जी लगभग एक घण्टे की सामायिक(भगवान का ध्यान) नियम लेकर किया करती थी सो उस दिन भी आवर्त करते ही एक घंटे का नियम ले रखा था।
                     आर्यिका रत्न माता जिस कक्ष में विराजमान थी उस कक्ष में हवा को रोकने के लिये खिड़की में बरसाती और दरवाजो, क्योंकि क्षेत्र चारो ओर से खुला हुआ है और जंगल मे पेड़ो की अधिकता और तालाब होने से सर्दी का प्रकोप सामान्य से अधिक ही बना रहता है।
                आर्यिका तपस्वी माँ के भगवान की साधना में करने के दौरान, क्षेत्र पर उपस्थित किसी श्राविका ने सामान्य सी आग रखा जाने वाला वर्तन आग के अंगारो सहित लेकर कमरे के बाहर हाथ गर्म करने की मंशा से रख दिया ताकि सामायिक(भगवान का ध्यान) के बाद गर्म हाथों से माता जी की बैयाबर्ती कर सके।
                 लेकिन होनी को शायद कुछ और मंजूर था किसी आवश्यक कार्य की याद आने पर उस आग के आंगरो से भरे वर्तन को वही छोड़ वह श्राविका वहां से कही चली गयी और हवा के प्रभाव से दरवाजे के बाहर लगे पर्दे व बरसाती ने आग पकड़ ली और फिर माता जी की चटाई भी जलने लगी।         
      चूंकि माता जी की सामायिक(भगवान के ध्यान) की अवधि में अभी शेष समय था सो उन्होंने जलना स्वीकार किया ना कि सामायिक(भगवान का ध्यान) को छोड़ना।
जिसके बाद मात्र दस मिनिट में ही कपड़ो में भी आग लग गयी जिससे गले तक का मांस लगभग जल गया और जल कर चटाई से चिपक गया इतना सब होता रहा फिर भी माता जी किसी चतुर्थ काल के कठिन साधक की तरह अपनी साधना में लीन रही और आत्मा से शरीर पृथक है इस भाव को ध्यान में लाती रही।
                  इसके बाद जब  घण्टे भर की अवधि पूर्ण होते ही उन्होंने अपनी चटाई को शरीर से अलग करने का प्रयास किया जिसमें उनकी खाल भी उनके शरीर से अलग हो गयी किन्तु माता जी तब भी बगैर किसी तरह का क्रंदन किये ज्यो की त्यों बैठी रही समयानुसार श्रावको ने पहुच कर जब यह दृश्य देखा तो आनन फानन में सागर के भाग्योदय अस्पताल के नेचरोपैथी में लाकर प्राकृतिक चिकित्सा शुरू करायी किन्तु आर्यिका रत्न माता जी तब तक समझ चुकी थी कि अब बचना मुश्किल है सो वे बार-बार समाधि के लिये कहती रही और स्वयं उत्तमार्थ प्रतिकमन करते हुए यम सलेखना को धारण कर लिया।
भाग्योदय नेचुरोपैथी की बहनों द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार माता जी अपने अंतिम समय तक बिलकुल चेतन रही और अंत अंत तक जाप के मंत्रों का उच्चारण करती रही।
*पूज्य आर्यिका माँ सुनयमति माताजी का अंतिम संबोधन*
 अपने अंतिम प्रवचन में श्रावकों को सम्बोधित करते हुए समाधिस्त आर्यिका माँ १०५ सुनयमति माता जी ने नैनागिरी मंदिर जी मे कहा कि,हम सभी ने 2019 अच्छे कार्यों में लिप्त रहते हुए व्यतीत किया है।
अब नए वर्ष का आगमन हो रहा है,औऱ 2020 का शुभारंभ हम सभी बड़ी शालीनता के साथ करने जा रहे हैं। प्रायः नए वर्ष की शुरुआत पर सब लोग मनोरंजन हेतु कही न कही घूमने जाते हैं,होटल आदि में खाना खाने जाते हैं और इस दौरान कितने ही पापों का उपार्जन करते हैं।
         माताजी ने सभी श्रावकों को नए वर्ष के अवसर पर किसी तीर्थ क्षेत्र के दर्शन करने की प्रेरणा दी। औऱ साथ ही होटल आदि में बने अभक्ष्य पदार्थों का सेवन न कर पुण्योपार्जन का मार्ग बताया ।
                  तथा इस संपूर्ण घटनाक्रम के बाद गौर करने वाली बात है अपने इस हाल में होने के बाद भी आर्यिका माता जी ने अपनी सेवा करने वाली एक ब्रह्मचारिणी बहिन के परिजनों को बुलाकर उनसे बहिन के शेष जीवन को अच्छे से पूरा कराने की भावना रखी तो साथ ही उन्होंने अपने पूरे होश के साथ सभी से माफी भी मांगी और सबको माफ भी किया।
तथा जैन धर्म के अनुसार समस्त प्रकार के त्याग को अंगीकार करते हुए लगभग 30 घण्टे बाद सुबह के लगभग चार बजे निश्चिन्त भावो से देव शास्त्र गुरु के स्मरण करते हुए अपनी देह का परित्याग किया।