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रविवार, 25 अप्रैल 2021

महावीर के सिद्धांतों में छुपी मानवीयता की शक्ति :- सुमित थापक

महावीर के सिद्धांतों में छुपी मानवीयता की शक्ति :- सुमित थापक

(सुमित थापक, सामाजिक कार्यकर्ता)



(जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर है भगवान महावीर)

लेख। संपूर्ण भारत में जैन समाज द्वारा भगवान महावीर के जन्मोत्सव को महावीर जयंती के रूप में मनाया जाता है तथा इस त्यौहार को महावीर जन्म कल्याणक के नाम से भी जाना जाता है।

महावीर जयंती प्रत्येक वर्ष चैत्र माह के 13 वे दिन मनाई जाती है. महावीर स्वामी का जन्म 599 ईसा पूर्व चेत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन कुण्डग्राम नामक स्थान पर हुआ था।

जो एक साधारण बालक के रूप में पैदा हुए लेकिन इन्होंने अपनी कठिन तपस्या से अपने जीवन को अनूठा बनाया जो आगे चलकर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर बने।

महावीर 30 वर्ष की आयु में संसार से विरक्त होकर राज वैभव त्याग कर सन्यास धारण कर कल्याण के पथ पर निकल पड़े जिन्हें 12 वर्षों की कठिन तपस्या के बाद जम्बूद्वीप में ऋजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे सच्चा ज्ञान प्राप्त हुआ।

महावीर ने अहिंसा को सबसे उत्तम तथा नैतिक गुण बताया है एवं इसके अलावा उन्होंने अनेकांतवाद,स्वादवाद, अपरिग्रह रहे जैसे अद्भुत सिद्धांत दिए हैं तो वहीं महावीर स्वामी द्वारा दिया गया पंचशील सिद्धांत ही जैन धर्म का आधार माना जाता है।

सत्य:- सत्य के बारे में महावीर स्वामी ने कहा है पुरुष तू सत्य को सच्चा तत्व समझ जो बुद्धिमान सत्य की ही आज्ञा में रहता है वह मृत्यु को भी तैर कर पार कर जाता है अतः सदैव सत्य बोलिये।

अहिंसा:- महावीर के अनुसार संसार के समस्त प्राणी मात्र के प्रति दया की भावना रखना चाहिए जितना आप स्वयं से प्रेम करते हैं उतना ही दूसरों से करें।

अस्तेय:- दूसरों की वस्तु को उसकी बिना अनुमति के ग्रहण करना जैन संतों में चोरी कहा गया है. किसी दूसरे की वस्तु को चुराना या दूसरे की चीजों की इच्छा करना महापाप है अतः जो मिला है उसमें ही संतुष्ट रहें।

अपरिग्रह:- महावीर कहते हैं कि जो व्यक्ति सजीव या निर्जीव चीजों का संग्रह करता है उसे सांसारिक दुखों से कभी छुटकारा नहीं मिल सकता यह दुनिया नास्वर है चीजों के प्रति मोह ही आपके दुखों का कारण है।

ब्रह्मचर्य:- ब्रह्मचर्य जो उत्तम तपस्या, नियम, ज्ञान, दर्शन, चरित्र, संयम और विनय की जड़ है तपस्या में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ तपस्या है अतः जो पुरुष स्त्रियों से मोह नहीं रखते वह मोक्ष प्राप्त करते हैं।

इस प्रकार महावीर स्वामी ने साधना एवं आत्म तत्व को नैतिक जीवन में सराहा है जो वर्तमान समाज में एक महत्वपूर्ण प्रेरणा है।