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सोमवार, 7 मार्च 2022

मातृत्व का संसार :- अनिकेत सिंह

 


तुम कलम हो तुम बलम हो, तुम प्यास हो एक पथिक की।

तुम मान हो, सम्मान हो और नाज हो दो घरों की।।

तुम पुत्री बनकर हो निभाती कार्य सब इस द्वार के।

फिर जब कहीं डोली में ले, ले जाता कोई इस द्वार से।

फिर जा वहां आती हो तुम एक लक्ष्मी के अवतार में।

फिर करती हो तुम सृजन मातृत्व के संसार में।।


फिर भरती हो तुम रोशनी मानवता के चिराग में।

फूंकती हो प्राण तुम देह के आकार में,

करती हो तुम श्रष्टि सृजन अपने ही अस्तित्व से,

मांग लेती प्राण यम से अपने ही सतित्व से। 

बिखरती रहो यूहीं विश्व के हर कोने में,

जब आंच हो अस्तित्व पर ना हो देर दुर्गा होने में।

गर सता रही हो बेड़ियां कोमलता पे कुकर्म की।

गर लग रही हो श्राप सी ये श्रष्टि भी कुधर्म सी।

कर दो संहार काली सा तुम मिटा दो ये वृत्ति कुकर्म की।

मत भूलो तुम कलम हो तुम बलम हो तुम प्यास हो एक पथ की।